मौद्रिककरण पाइपलाइन से आधारभूत सुविधाओं के विकास में आयेगी तेजी : पांडेय
नयी दिल्ली ।
राष्ट्रीय मौद्रिकरण पाइपलाइन को लेकर भले ही सरकार की कड़ी आलोचना हो रही है लेकिन देश में आधारभूत सुविधाओं के विकास के लिए इसकी आवश्यकता है ताकि इसके माध्यम से पूंजी जुटायी जा सके। विनिवेश एवं लोक संपदा प्रबंधन विभाग (दीपम) के सचिव तुहिन कांत पांडेय ने मंगलवार को कहा कि राष्ट्रीय मौद्रिकरण पाइपलाइन कोई नयी चीज नहीं है बल्कि यह सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) का ही नया स्वरूप है। इसमें संबंधित कंपनियों को स्वामित्व का अधिकार नहीं दिया जायेगा सिर्फ उसे कुछ अधिकार दिये जायेंगे जो एक निश्चित समयावधि के लिए होगा।
उन्होंने कहा कि वर्ष 2019 में घोषित 111 लाख करोड़ रुपये के राष्ट्रीय इंफ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन में ही इसकी व्यवस्था की गयी थी और उसी के अनुरूप 111 लाख करोड़ रुपये में से 15 से 17 फीसदी इनोवेटिव तरीके से जुटाने की बात कही गयी थी और राष्ट्रीय मौद्रिकरण पाइपलाइन उसी का हिस्सा है। इससे मात्र छह लाख करोड़ रुपये जुटाने की बात कही गयी है जबकि वर्ष 2019 से 25 के दौरान 111 लाख करोड़ रुपये का निवेश किया जा रहा है।
श्री पांडेय ने कहा कि बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी जो परियोजनायें पूरी हो चुकी है और जिसका पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा है या बेहतर सेवायें नहीं मिल पा रही है वैसी परियोजनाओं को राष्ट्रीय मौद्रिकरण पाइपलाइन के जरिये निजी क्षेत्रों को दिया जायेगा। इसमें किसी भी संपदा का स्वामित्व नहीं दिया जायेगा बल्कि कुछ अधिकार दिये जायेंगे जो एक निश्चित समय के लिए होंगे। उसके बाद वह संपदा फिर से सरकार के स्वामित्व में आ जायेगी।
उन्होंने कहा कि पीपीपी मॉडल की शुरुआत बहुत पहले ही की गई थी। वर्ष 1960-75 के दौरान राष्ट्रीयकरण का दौर था। 1980 में उदारीकरण की शुरुआत हुयी। इसके बाद 1991 में औद्योगिक उदारीकरण की गयी और इससे औद्योगिक क्षेत्र में भारी बदलाव आया। इसके बाद सेवा क्षेत्र भी धीरे-धीरे निजी क्षेत्रों के लिए खुला, जिससे लोगों को बेहतर सेवायें मिलने लगी। निजी क्षेत्र हर तरह की सेवायें या बुनियादी सुविधाओं के विकास के लिए काम नहीं कर सकता है क्योंकि उसका नुकसान होगा तो वह काम नहीं करेगा लेकिन सरकार को ग्रामीण क्षेत्रों में सेवायें देनी होती है। बुनियादी सुविधाओं का विकास करना पड़ता है।
श्री पांडेय ने कहा कि शिक्षा, स्वास्थ्य सहित विभिन्न क्षेत्रों में निवेश करना पड़ता है ताकि गरीबों और किसानों को लाभ पहुंच सके और वे विकास की मुख्यधारा से जुड़ सके। इन सबके लिए बड़े पैमाने पर धनराशि की जरूरत होती है और कोरोना काल में अधिक राजस्व के लिए न तो आयकर बढ़ाया जा सकता है और न ही जीएसटी में बढोतरी की जा सकती है। इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुये ही राष्ट्रीय मौद्रिकरण पाइपलाइन की शुरुआत की गयी है ताकि जो परियोजनायें पूर्ण हो चुकी है और उसका पूर्ण दोहन नहीं हो रहा है तो ऐसी स्थिति में मौद्रिकरण के माध्यम से पूंजी जुटायी जा सके और उसका उपयोग दूसरी परियोजनाओं के लिए हो सके। जो राशि 20 साल या उसके बाद तक आने वाली है उसको मौद्रिकरण के माध्यम से पहले ही वसूलने की योजना है।
