लाभकारी खेती की दिशा में एक और कदम
केन्द्र सरकार ने रबी फसलों के अंतर्गत गेहूँ, रेपसीड, सरसों, मसूर, जौ और कुसुम फूल के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित कर दिये हैं। यह घोषणा कई दृष्टिओं से महत्वपूर्ण है। सबसे पहली बात तो यही है कि अभी खरीफ फसल की कटाई शुरू नहीं हुई है और रबी फसल को बोने जाने के लिए पर्याप्त समय है। इसका अर्थ यह है कि सरकार यह चाहती कि किसान रबी फसल बोने के पहले यह जान लें कि वर्ष 22-23 में किस फसल के लिए क्या न्यूनतम मूल्य होगा और यह जानकर वे निर्णय ले कि उन्हें कौन सी फसल लेने में ज्यादा फायदा है। दूसरी बड़ी बात यह है कि इस समय बाजार में सरसों, रेपसीड और मसूर की दाल के मूल्य ऐतिहासिक ऊँचाई पर हैं और किसान इस स्थिति का लाभ लेकर पारंपरिक खाद्यान्न की उपज लेने से कुछ हटकर तिलहन और दलहन की उपज लेने का निर्णय ले सकता है।
इस बार सरकार ने पिछले वर्ष की तुलना में न्यूनतम समर्थन मूल्य गेहूँ के लिए मामूली तौर पर 2 प्रतिशत ज्यादा, दाल के लिए 7.8 प्रतिशत ज्यादा और तिलहन के लिए 8.6 प्रतिशत ज्यादा बढ़ायें हैं। मसूर की दाल, रेपसीड और सरसों के मूल्य में सबसे अधिक बढ़ोतरी चार सौ रूपये प्रति क्विंटल की गई है। चने के मूल्य में एक सौ तीस रूपये प्रति क्विंटल और कुसुम के फूल के मूल्य में एक सौ चैदह रूपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की गई है। गेहूँ का मूल्य चालीस रूपये प्रति क्विंटल और जौ का पैंतीस रूपये प्रति क्विंटल मूल्य बढ़ाया गया।
न्यूनतम समर्थन मूल्य इस तरह निर्धारित किए गए हैं जिससे किसानों को उनकी फसल के लिए उत्पादन लागत को देखते हुए अधिकतम कीमत मिले। उत्पादन लागत का विचार करते समय मजदूरी, बैल या मशीनों से जुताई, भूमि के किराये, बीज, खाद, सिंचाई, डीजल, बिजली आदि के खर्चों को तो शामिल किया ही गया है, बड़ी बात यह है कि इसमें परिवार के द्वारा किये जाने वाले श्रम के मूल्य को भी ध्यान में रखा गया है। कोशिश यह की गई है कि किसान खेती पर जितना खर्च करता है उससे उसको अधिक से अधिक लाभ मिल सके। इस तरह गेहूँ, रेपसीड और सरसों के उत्पादन से 100 प्रतिशत लाभ, चना के उत्पादन से 74 प्रतिशत लाभ, जौ के उत्पादन से 60 प्रतिशत लाभ और कुसुम के फूल के उत्पादन से 50 प्रतिशत लाभ होने का अनुमान है।
इस कदम का एक उद्देश्य यह भी है कि तिलहन, दलहन और मोटे अनाज के न्यूनतम समर्थन मूल्य में एकरूपता लाई जाए ताकि इन फसलों की खेती बढ़ सके। सरकार का एक और प्रयास यह है कि खाद्य तेलों का घरेलू उत्पादन बढ़े और उसके आयात पर निर्भरता कम हों। इस लिहाज से किसानों को तिलहन का उत्पादन बढ़ानें को प्रेरित किया जा रहा है।
कृषि उत्पादन के मामले में भारत का विश्व में स्थान दूसरा है। पिछले कुछ समय में भारत की औद्योगिक और अन्य क्षेत्रों में तीव्र प्रगति के कारण जीडीपी में कृषि का योगदान कम होता जा रहा है। इस समय भारत की जीडीपी में कृषि का योगदान लगभग 15 प्रतिशत है। बहरहाल, यह गौर करने की बात है कि कोविड महामारी के दौरान जब पूरी अर्थव्यवस्था नीचे जा रही थी तब कृषि के क्षेत्र में जीडीपी 3.4 प्रतिशत बढ़ी थी। यह कठोर सच्चाई यह सिद्ध करती है कि भारतीय अर्थव्यवथा में कृषि का महत्व सर्वोपरि है। इतना ही नहीं, भारत की सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में भी कृषि और कृषक का स्थान अत्यंत सम्माननीय है।
बहरहाल, इस स्थिति का एक विरोधाभासी पहलू यह है कि हमारे कृषकों में 82 प्रतिशत लघु और सीमांत कृषक हैं जो अपने खेतों के छोटे-छोटे आकार, बाजार की अनिश्चितता, बिचैलियों के कुचक्र और राज्यों के विपणन संबंधी कानूनों के मकडज़ाल के कारण गरीबी से उबर नहीं पाते हैं। और यहीं कारण है कि यह वर्ग हमारे समाज का सबसे शोषित और पीडि़त वर्ग है। इधर पिछले सात सालों में केन्द्र सरकार ने आम तौर पर सभी कृषकों की आर्थिक मजबूती के लिए कदम उठाएं हैं। बहरहाल, सरकार के इन कदमों का प्रमुख उद्देश्य लघु और सीमांत किसानों को अधिकतम सुविधा उपलब्ध कराना है जिससे वे शोषण और गरीबी से मुक्त हो सकें।
केन्द्र सरकार ने किसानों की औसत आय को सन् 2022 तक दोगुना करने का अपना लक्ष्य बनाया है। और इस लक्ष्य को पाने के लिए बहुआयामी और समावेशी कदम उठाए जा रहे हैं। कृषि से आय को बढ़ाने के लिए जो रणनीति अपनायी गई है उसमें फसलों की उत्पादकता बढ़ाने, पशुधन की उत्पादकता बढ़ाने, कृषि पर लगने वाली लागत को घटाने और उसकी क्षमता को बढ़ाने, फसल की सघनता को बढ़ाने, नगद फसल लेने पर जोर देते हुए फसल चक्र को परिवर्तित करने और किसानों को मिलने वाले फसल के मूल्य को बढ़ाने पर ध्यान दिया जा रहा है। किसानों को फसल का लाभकारी मूल्य मिल सके इसके लिए उसके विपणन की व्यवस्था को भी सुधारने का लक्ष्य है। यह उल्लेखनीय है कि केन्द्र सरकार ने ‘प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान’ 2018 में शुरू किया है इसके तहत किसानों को मूल्य समर्थन योजना, मूल्य न्यूनता भुगतान योजना और निजी खरीद और स्टॉकिस्ट योजना को शुरू किया गया है। यह उम्मीद की जा सकती है कि रबी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि करने से कृषकों का आर्थिक स्तर बेहतर होगा और उनका खेती किसानी में भरोसा मजबूत होगा।
इसी परिप्रेक्ष्य में केन्द्र सरकार ने कुछ ठोस और भी नवाचारी उपाय किये हैं। इन उपायों में सतत् कृषि के लिए राष्ट्रीय मिशन, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, परम्परागत कृषि सिंचाई योजना, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना और सूक्ष्म सिंचाई कोष जैसी योजनाएँ शामिल है। इनके अतिरिक्त, किसानों को सीधा लाभ पहुंचाने के लिए प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना चल रही है जिसके तहत लघु और सीमांत किसानों को छ: हजार रूपये प्रति वर्ष की राशि, सीधे उनके खाते में, उपलब्ध करायी जा रही है।
इसी क्रम में भारत सरकार ने पिछले वर्ष ऐतिहासिक महत्व के तीन बड़े कदम उठाए हैं। इन कदमों का उद्देश्य यह है कि किसानों को उनकी उपज का अधिकतम लाभ मिल सके और भारत की कृषि अर्थ व्यवस्था का रूपान्तरण हो सके। देश में कृषि उपज भण्डारण की क्षमता कम होने के कारण जल्दी खराब होने वाले कृषि उत्पाद बर्बाद होते हैं और तत्काल बेचने की मजबूरी के कारण किसानों को कम मूल्य मिलता है। सरकार कोशिश यह कर रही है कि कृषि के क्षेत्र में निजी और विदेशी निवेश बढ़ाया जाये जिससे कि नए, बड़े और बेहतर तकनीक वाले कोल्ड स्टोरेज मिल सकें। यह विदित है कि देश में अधिकांश किसान लघु और सीमान्त किसान की श्रेणी में आते हैं जिनके लिए खेती लाभदायी नहीं हो पाती। ऐसे किसानों को न तो उन्नत कृषि प्रणाली के प्रयोग की सुविधा मिलती है, न सिंचाई और न ऋण संबंधी सुविधाओं का अधिकतम लाभ। लघु और सीमांत किसानों को इस परेशानी से बचाने के लिए अनुबंध के आधार पर खेती की व्यवस्था शुरू करने का विचार है। अभी किसानों को अपनी उपज अपने जिले से बाहर बेचने की सुविधा नहीं है। सरकार यह कोशिश कर रही है कि किसानों को बिचैलियों से मुक्ति मिले और वे अपनी उपज अन्य जिलों और दूसरे राज्य में बेच सकें जिससे उन्हें अपनी उपज का अधिकतम लाभ मिले। कृषि उत्पाद की ऑनलाइन ट्रेडिंग प्लेटफार्म के लिए राष्ट्रीय कृषि बाजार अर्थात ईनाम की व्यवस्था से किसानों को बेहतर कीमत और सुचारू विपणन की सुविधा उपलब्ध कराई गयाी है। वास्तव में अब डिजीटल व्यवस्था का भी लाभ किसानों को बड़े पैमाने पर मिल रहा।
समग्रत:, इन उपायों का ग्रामीण भारत पर सकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है और मेहनतकश किसानों को उनकी मेहनत का बेहतर प्रतिफल मिल रहा है। इससे कृषि अर्थ व्यवस्था का रूपान्तरण शुरू हुआ है और देश ”एक भारत, एक कृषि बाजार” के साथ ”आत्मनिर्भर भारत” के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
इस बार सरकार ने पिछले वर्ष की तुलना में न्यूनतम समर्थन मूल्य गेहूँ के लिए मामूली तौर पर 2 प्रतिशत ज्यादा, दाल के लिए 7.8 प्रतिशत ज्यादा और तिलहन के लिए 8.6 प्रतिशत ज्यादा बढ़ायें हैं। मसूर की दाल, रेपसीड और सरसों के मूल्य में सबसे अधिक बढ़ोतरी चार सौ रूपये प्रति क्विंटल की गई है। चने के मूल्य में एक सौ तीस रूपये प्रति क्विंटल और कुसुम के फूल के मूल्य में एक सौ चैदह रूपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की गई है। गेहूँ का मूल्य चालीस रूपये प्रति क्विंटल और जौ का पैंतीस रूपये प्रति क्विंटल मूल्य बढ़ाया गया।
न्यूनतम समर्थन मूल्य इस तरह निर्धारित किए गए हैं जिससे किसानों को उनकी फसल के लिए उत्पादन लागत को देखते हुए अधिकतम कीमत मिले। उत्पादन लागत का विचार करते समय मजदूरी, बैल या मशीनों से जुताई, भूमि के किराये, बीज, खाद, सिंचाई, डीजल, बिजली आदि के खर्चों को तो शामिल किया ही गया है, बड़ी बात यह है कि इसमें परिवार के द्वारा किये जाने वाले श्रम के मूल्य को भी ध्यान में रखा गया है। कोशिश यह की गई है कि किसान खेती पर जितना खर्च करता है उससे उसको अधिक से अधिक लाभ मिल सके। इस तरह गेहूँ, रेपसीड और सरसों के उत्पादन से 100 प्रतिशत लाभ, चना के उत्पादन से 74 प्रतिशत लाभ, जौ के उत्पादन से 60 प्रतिशत लाभ और कुसुम के फूल के उत्पादन से 50 प्रतिशत लाभ होने का अनुमान है।
इस कदम का एक उद्देश्य यह भी है कि तिलहन, दलहन और मोटे अनाज के न्यूनतम समर्थन मूल्य में एकरूपता लाई जाए ताकि इन फसलों की खेती बढ़ सके। सरकार का एक और प्रयास यह है कि खाद्य तेलों का घरेलू उत्पादन बढ़े और उसके आयात पर निर्भरता कम हों। इस लिहाज से किसानों को तिलहन का उत्पादन बढ़ानें को प्रेरित किया जा रहा है।
कृषि उत्पादन के मामले में भारत का विश्व में स्थान दूसरा है। पिछले कुछ समय में भारत की औद्योगिक और अन्य क्षेत्रों में तीव्र प्रगति के कारण जीडीपी में कृषि का योगदान कम होता जा रहा है। इस समय भारत की जीडीपी में कृषि का योगदान लगभग 15 प्रतिशत है। बहरहाल, यह गौर करने की बात है कि कोविड महामारी के दौरान जब पूरी अर्थव्यवस्था नीचे जा रही थी तब कृषि के क्षेत्र में जीडीपी 3.4 प्रतिशत बढ़ी थी। यह कठोर सच्चाई यह सिद्ध करती है कि भारतीय अर्थव्यवथा में कृषि का महत्व सर्वोपरि है। इतना ही नहीं, भारत की सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में भी कृषि और कृषक का स्थान अत्यंत सम्माननीय है।
बहरहाल, इस स्थिति का एक विरोधाभासी पहलू यह है कि हमारे कृषकों में 82 प्रतिशत लघु और सीमांत कृषक हैं जो अपने खेतों के छोटे-छोटे आकार, बाजार की अनिश्चितता, बिचैलियों के कुचक्र और राज्यों के विपणन संबंधी कानूनों के मकडज़ाल के कारण गरीबी से उबर नहीं पाते हैं। और यहीं कारण है कि यह वर्ग हमारे समाज का सबसे शोषित और पीडि़त वर्ग है। इधर पिछले सात सालों में केन्द्र सरकार ने आम तौर पर सभी कृषकों की आर्थिक मजबूती के लिए कदम उठाएं हैं। बहरहाल, सरकार के इन कदमों का प्रमुख उद्देश्य लघु और सीमांत किसानों को अधिकतम सुविधा उपलब्ध कराना है जिससे वे शोषण और गरीबी से मुक्त हो सकें।
केन्द्र सरकार ने किसानों की औसत आय को सन् 2022 तक दोगुना करने का अपना लक्ष्य बनाया है। और इस लक्ष्य को पाने के लिए बहुआयामी और समावेशी कदम उठाए जा रहे हैं। कृषि से आय को बढ़ाने के लिए जो रणनीति अपनायी गई है उसमें फसलों की उत्पादकता बढ़ाने, पशुधन की उत्पादकता बढ़ाने, कृषि पर लगने वाली लागत को घटाने और उसकी क्षमता को बढ़ाने, फसल की सघनता को बढ़ाने, नगद फसल लेने पर जोर देते हुए फसल चक्र को परिवर्तित करने और किसानों को मिलने वाले फसल के मूल्य को बढ़ाने पर ध्यान दिया जा रहा है। किसानों को फसल का लाभकारी मूल्य मिल सके इसके लिए उसके विपणन की व्यवस्था को भी सुधारने का लक्ष्य है। यह उल्लेखनीय है कि केन्द्र सरकार ने ‘प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान’ 2018 में शुरू किया है इसके तहत किसानों को मूल्य समर्थन योजना, मूल्य न्यूनता भुगतान योजना और निजी खरीद और स्टॉकिस्ट योजना को शुरू किया गया है। यह उम्मीद की जा सकती है कि रबी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि करने से कृषकों का आर्थिक स्तर बेहतर होगा और उनका खेती किसानी में भरोसा मजबूत होगा।
इसी परिप्रेक्ष्य में केन्द्र सरकार ने कुछ ठोस और भी नवाचारी उपाय किये हैं। इन उपायों में सतत् कृषि के लिए राष्ट्रीय मिशन, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, परम्परागत कृषि सिंचाई योजना, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना और सूक्ष्म सिंचाई कोष जैसी योजनाएँ शामिल है। इनके अतिरिक्त, किसानों को सीधा लाभ पहुंचाने के लिए प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना चल रही है जिसके तहत लघु और सीमांत किसानों को छ: हजार रूपये प्रति वर्ष की राशि, सीधे उनके खाते में, उपलब्ध करायी जा रही है।
इसी क्रम में भारत सरकार ने पिछले वर्ष ऐतिहासिक महत्व के तीन बड़े कदम उठाए हैं। इन कदमों का उद्देश्य यह है कि किसानों को उनकी उपज का अधिकतम लाभ मिल सके और भारत की कृषि अर्थ व्यवस्था का रूपान्तरण हो सके। देश में कृषि उपज भण्डारण की क्षमता कम होने के कारण जल्दी खराब होने वाले कृषि उत्पाद बर्बाद होते हैं और तत्काल बेचने की मजबूरी के कारण किसानों को कम मूल्य मिलता है। सरकार कोशिश यह कर रही है कि कृषि के क्षेत्र में निजी और विदेशी निवेश बढ़ाया जाये जिससे कि नए, बड़े और बेहतर तकनीक वाले कोल्ड स्टोरेज मिल सकें। यह विदित है कि देश में अधिकांश किसान लघु और सीमान्त किसान की श्रेणी में आते हैं जिनके लिए खेती लाभदायी नहीं हो पाती। ऐसे किसानों को न तो उन्नत कृषि प्रणाली के प्रयोग की सुविधा मिलती है, न सिंचाई और न ऋण संबंधी सुविधाओं का अधिकतम लाभ। लघु और सीमांत किसानों को इस परेशानी से बचाने के लिए अनुबंध के आधार पर खेती की व्यवस्था शुरू करने का विचार है। अभी किसानों को अपनी उपज अपने जिले से बाहर बेचने की सुविधा नहीं है। सरकार यह कोशिश कर रही है कि किसानों को बिचैलियों से मुक्ति मिले और वे अपनी उपज अन्य जिलों और दूसरे राज्य में बेच सकें जिससे उन्हें अपनी उपज का अधिकतम लाभ मिले। कृषि उत्पाद की ऑनलाइन ट्रेडिंग प्लेटफार्म के लिए राष्ट्रीय कृषि बाजार अर्थात ईनाम की व्यवस्था से किसानों को बेहतर कीमत और सुचारू विपणन की सुविधा उपलब्ध कराई गयाी है। वास्तव में अब डिजीटल व्यवस्था का भी लाभ किसानों को बड़े पैमाने पर मिल रहा।
समग्रत:, इन उपायों का ग्रामीण भारत पर सकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है और मेहनतकश किसानों को उनकी मेहनत का बेहतर प्रतिफल मिल रहा है। इससे कृषि अर्थ व्यवस्था का रूपान्तरण शुरू हुआ है और देश ”एक भारत, एक कृषि बाजार” के साथ ”आत्मनिर्भर भारत” के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
