निरीह शिक्षक का पत्र
आदरणीय सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी, सादर प्रणाम। मैं आशा करता हूं कि आप स्वर्ग में अपने तमाम साथियों के साथ मजे में होंगे। आपका एक एहसान हम सभी शिक्षक कभी भी नहीं भूलेंगे।आप के कारण ही साल में कम से कम एक दिन यानी पांच सितंबर को हमारा दिवस होता है और उसी एक दिन हमारा भी सम्मान होता है और हमें पूजनीय भी बताया जाता है। इस दिन ही हमें महसूस होता है कि हमारा भी वजूद है और हमारी भी कुछ पूछ परख बची है। कहा गया है कि सभी तरह के दान में ज्ञानदान ही सर्वश्रेष्ठ है और आज के दिन ही हमें लगता है कि हम यह पवित्र कार्य कर रहे हैं ।कुछ लोग यह भी प्रश्न करते हैं कि तुम लोग दान नहीं कर रहे हो और तुम्हें इस काम के लिए मजूरी भी मिलती है। सही कहते हैं लोग, यह मजूरी ही है जो हमारे काम की तुलना में अत्यंत कम है 7 आप जानते ही हैं मजदूर कम मजूरी पाने के लिए अभिशप्त है — उसके लिए कानून तक पूंजीपतियों से पूछकर बनाए जाते हैं 7 चूंकि शिक्षक को मजूरी मिलती है सो शिक्षक मजदूर से भी अधिक मजबूर है 7 मजदूर को केवल मजदूरी करनी पड़ती है परंतु शिक्षकों को कई तरह की हमाली करनी पड़ती है।
मैं सरकारी स्कूल का एक साधारण शिक्षक हूँ, जिसे तमाम असाधारण काम करने पड़ते हैं । हम एक सामान्य शिक्षक ही रहना चाहते थे, जो बच्चों को ढंग से शिक्षादान दे सके, परंतु भला हो देश के चौपट राजाओं का, जिन्होंने हमें सामान्य शिक्षक से महामानव बना दिया ।आपने स्वर्ग में चार हाथों वाले भगवान देखे होंगे परंतु यदि आप आज यहां होते तो चार हाथों वाले शिक्षकों के दर्शन हो जाते । इस बात को कोई माने या न माने परंतु प्रशासन अवश्य ही मानता है, इनका मानना है कि शिक्षक के लिए कोई भी काम असंभव नहीं है और जो काम कोई दूसरा न कर सके उसे शिक्षक अवश्य ही कर गुजरता है। उससे अपेक्षित कामों की फेहरिस्त काफी लंबी है -चुनाव, जनगणना, सर्वेक्षण, जुलूस ,बीमारी ,महामारी, आपदा नियंत्रण आदि। जिस तरह से मीडिया की अंतिम प्राथमिकता बेरोजगारी, भुखमरी, आर्थिक बदहाली को दिखाना है, उसी तरह से सभी सरकारों की अंतिम प्राथमिकता बच्चों की शिक्षा है ।आपने बताया था कि शिक्षक राष्ट्र निर्माता है और शिक्षण एक पवित्र कार्य है। मैंने पढ़ा है कि अमेरिका और यूरोप में शिक्षकों को सम्मानजनक वेतन दिया जाता है ।हमारे देश के सभी राज्यों में शिक्षकों का वेतन कम है ,अन्य मामलों में राज्यों में मतभेद हो सकता है परंतु इस मामले में वे सभी एकमत हैं ।शिक्षकों का वेतन कम करने के कई तरीके ईजाद किए गए हैं । नए-नए पदों का सृजन यह ध्यान में रखकर किया गया कि कैसे उनके वेतन में कटौती की जाए और वे इसमें सफल भी रहे हैं ।देश के लगभग सभी राज्यों ने यह किया ।इसका परिणाम था कि शिक्षाकर्मी, शिक्षामित्र ,गुरु जी अवतरित हुए। इन पदों पर भर्ती भी अपेक्षाकृत आसान की गई। काम वही परंतु वेतन कम ।बाद में दबाव में सात-आठ साल बाद इन्हें नियमित किया गया ।सरकारों के पास प्रत्येक कार्य के लिए पैसा है परंतु शिक्षकों को उनका वाजिब वेतन नहीं दिया जाता है ।कर्ज ऋण माफी ,एनपीए ,सब्सिडी, सस्ता या मुफ्त अनाज पर अरबों रुपए खर्च किए जाते हैं, परंतु राष्ट्र निर्माता के लिए कुछ करोड़ भी खर्च नहीं किए जाते हैं ।गरीब परिवारों को मुफ्त अनाज के बदले मुफ्त शिक्षा दी जानी चाहिए ताकि वे अपनी रोजी-रोटी स्वयं कमा सकें और किसी के मोहताज न हो ।हमारी तकलीफों को दिखाने का मीडिया के पास न ही टाइम है और न ही इच्छा। आप ही देश के नेताओं से हॉटलाइन पर बात कर हमारी तकलीफ दूर कर सकते हैं परंतु ध्यान रहे कि उन्हें मेरा-नाम पता न बताएं,अन्यथा सरकारी एजेंसियां इस निरीह शिक्षक का जीना मुश्किल कर देंगी। मुझे इजाजत दीजिए, सफाई कर्मचारी आज स्कूल नहीं आए हैं अत: हम शिक्षकों को ही स्कूल की साफ सफाई भी करनी है। आपका अपना- रामलाल ,शिक्षक,ग्राम -नारधा, जिला दुर्ग, छत्तीसगढ़।
