सामुदायिक प्रयासों से मुक्ति संभव

क्या किसी खेल में हार या जीत का असर आधी दुनिया का शोषण बढ़ा सकता है? ‘हांÓ में उत्तर उस अध्ययन के बाद दिया जा रहा है जो कि 2014 में लैंकास्टर यूनिवर्सिटी ने तीन यूरो वर्ल्ड कप के फाइनल के बाद उत्तर-पश्चिमी इंग्लैंड में किया। परिणाम अचंभित करने वाले थे ‘यूरो कप के फाइनल में इंग्लैंड जीते तो घरेलू हिंसा 26 प्रतिशत बढ़ जाती है, हारे तो 38 प्रतिशत।Ó यूरो 2020 में इंग्लैंड की काउंसिल द्वारा चलाया गया अभियान ‘शो डोमेस्टिक एब्यूज रेड कलरÓ कहता है कि किसी मैच से उम्मीद, जोश, कुंठा और अंतत: मायूसी के चलते लोग गुस्सा अपने जीवनसाथी पर निकालते हैं।
‘पर क्यों? यह प्रश्न बहुत गंभीर है। दरअसल इस पूरी सोच का केंद्र बिंदु पितृसत्तात्मक समाज के उस तथाकथित शक्ति संतुलन की व्यवस्था से है जो पत्नी को पति की निजी संपत्ति मानता है और जिसके चलते हताशा, निराशा या किसी भी प्रकार के भावनात्मक दबाव में वह उसके साथ हिंसात्मक व्यवहार करता है। अमूमन इस हिंसात्मक व्यवहार की प्रतिक्रिया नहीं होती, महिलाएं चुपचाप इस हिंसा को सहन करती हैं क्योंकि जहां सामाजिक व्यवस्थागत ढांचा पुरुषों को विशेषाधिकार देता है, वहीं दूसरी ओर स्त्री से उसके मानवोचित अधिकार उसके जन्मते ही छीन लेता है और यही पितृसत्तात्मक व्यवस्था के शक्ति संतुलन का गणित भी है। यह व्यवस्था विकसित से लेकर विकासशील देशों में यथावत रूप से कायम है।
महिलाएं शोषण का विरोध क्यों नहीं करती? दुनिया के 155 देशों में घरेलू हिंसा से संरक्षण के लिए कानूनी व्यवस्थाएं हैं, बाबजूद इसके घरेलू हिंसा में कहीं कोई कमी दर्ज नहीं की गई । क्या कोई यह सहजता से विश्वास करेगा कि इस चुप्पी की कीमत हर रोज दुनिया में 137 महिलाओं को अपने अंतरंग संबंधों में हिंसा के चलते जान देकर चुकानी पड़ती है। अध्ययन बताते हैं कि दुनिया भर में मात्र 10 प्रतिशत महिलाएं ही घरेलू हिंसा के विरुद्ध पुलिस का दरवाजा खटखटाती हैं । यह आंकड़े यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि महिलाएं पारिवारिक प्रतिष्ठा के समक्ष शारीरिक और मानसिक पीड़ा का चुनाव करती हैं।
देश कोई भी हो, महिलाओं पर एक अनकहा दबाव होता है अपने घर को बांधे रखने का। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि उनकी सहनशीलता और त्याग को उनकी विवशता समझा जाता है और शोषणकर्ता इस गलतफहमी में और भी अधिक हिंसक और दंभी हो जाता है, पर क्या यह व्यवस्था यूं ही चलती रहेगी? वैधानिक प्रावधान घरेलू हिंसा से मुक्ति का मार्ग अगर प्रशस्त कर पाते तो यकीनन उन देशों में घरेलू हिंसा समाप्त हो चुकी होती जहां घरेलू हिंसा संरक्षण अधिनियम है। घरेलू हिंसा की शिकार महिलाएं वैतनिक कार्य तो दूर, घरेलू काम जैसे अवैतनिक काम करने में भी अक्षम हो जाती हैं।
दूसरी ओर कनाडा के राष्ट्रीय सैंपल के अध्ययन के मुताबिक जिन युवाओं ने अपने परिवारों में घरेलू हिंसा देखी है, उनमें आत्महत्या की प्रवृत्ति उन युवाओं की अपेक्षाकृत 15.3 प्रतिशत अधिक होती है, जिन्होंने घरेलू हिंसा नहीं देखी है। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि सामाजिक व्यवस्था के उस विकृत ढांचे को सुधारा जाए जो पुरुषत्व के उस विषाक्त भाव को उत्पन्न करता है, जिसका सीधा संबंध स्त्री पर नियंत्रण करने की मानसिकता से है। ब्राजील में 1997 में ‘प्रोमुंडोंÓ कार्यक्रम की शुरुआत की गई। इस कार्यक्रम में 10 से 24 साल तक की आयु के लड़कों को लैंगिक समानता और महिलाओं से अच्छे बर्ताव का सबक सिखाया जाता है। इथियोपिया में हुए एक अध्ययन में पाया गया कि ‘प्रोमुंडोÓ के कार्यक्रम में शामिल होने के बाद पुरुषों के महिलाओं से हिंसा के मामलों में 20 प्रतिशत की कमी हुई। वहीं स्वीडन में पिछले दो दशकों से प्राथमिक और माध्यमिक स्तर के स्कूलों में समानता, हिंसा और एक-दूसरे के आदर जैसे विषयों पर परियोजनाएं चल रही हैं और विश्वविद्यालयों में महिलाओं के खिलाफ पुरुषों की हिंसा के विरोध को अनिवार्य विषय बना दिया गया है।
घरेलू हिंसा रोकने के लिए संपूर्ण समाज की सहभागिता आवश्यक है। फिलहाल इस संदर्भ में युगांडा का मॉडल 20 देश अपना रहे हैं । युगांडा में पुरुष-स्त्री के संबंधों में समानता लाने और महिलाओं के प्रति पुरुषों के दृष्टिकोण को बदलने के लिए समुदाय में सामंजस्यपूर्ण एवं समानता पर आधारित संबंध बनाने की शिक्षा दी जा रही है, जिसके चलते 52 प्रतिशत घरेलू हिंसा के मामलों में कमी आई है वहीं दूसरा मॉडल दक्षिण अफ्रीका का है जहां समुदायों में घरेलू हिंसा की नकारात्मकता को उजागर करना और लैंगिक समानता के लाभों को प्रचार करके महिलाओं के स्तर को उठाया जा रहा है ।
भारत में भी कुछ इसी तरह की पहल 2011 में पुणे में इक्वल कम्युनिटी फाउंडेशन ने ‘एक्शन फॉर इक्वैलिटीÓ कार्यक्रम की शुरुआत करके की। इस कार्यक्रम का उद्देश्य किशोर आयु के लड़कों को महिलाओं के विरुद्ध होने वाली हिंसा के प्रति जागरूक और संवेदनशील बनना है। यह तय है कि घरेलू हिंसा से निपटने के लिए पुरुष और स्त्री के संबंधों में समानता लाने और महिलाओं के प्रति पुरुषों के दृष्टिकोण को बदलने के लिए सामुदायिक स्तर पर प्रयास करने होंगे।

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