नये वेरिएंट और तीसरी लहर की चुनौती
डॉ. जगत राम, डॉ. राकेश कोछड़
भारत में कोविड-19 की दूसरी लहर में रोजाना 4 लाख नये केसों की ऊंचाई छूने के बाद अब संक्रमित हुए लोगों की संख्या उतार पर है, तथापि तीसरी लहर की आशंका बरकरार है। लॉकडाउन में ढील के बाद लोगों ने सावधानियों की परवाह करनी बंद कर दी है। वे पहाड़ों की सैर पर यूं निकले हुए हैं, मानो ‘पिछला बदलाÓ चुका रहे हों। इस तरह अपने साथ सबको नये खतरे में डाल रहे हैं।
लगभग एक सदी पहले आए स्पैनिश फ्लू वैश्विक महामारी के दौरान चार लहरें आई थीं। कई देशों में मौजूदा नॉवेल कोरोना वायरस-कोव-2 की तीसरी लहर आ चुकी है। बेल्जियम की महिला को एक साथ दो प्रतिरूपों (वेरिएंट) से पीडि़त पाया गया है, इससे स्थिति और गंभीर बन चली है। भारत में भी एक महिला पाई गयी है, जिसको एक साल बाद दुबारा कोविड संक्रमण हुआ है।
यूके, अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया में कोविड के मामलों में मौजूदा उफान का संबंध कोरोना के डेल्टा वेरियंट से है। यह प्रतिरूप कोविड के उन चार वेरिएंट्स में से एक है, जिसको ‘चिंता का विषयÓ श्रेणी में रखा गया है। कोई वेरियंट तब बनता है जब उसकी जैविक संरचना (ऑर्गेनिस्म) में उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) होता है। यह म्यूटेशन या बदलाव उस वक्त भी हो सकता है जब ऑर्गेनिस्म प्रजनन करते वक्त ‘प्रतिलिपि गलतीÓ (कॉपिंग एरर) कर जाए।
किसी वायरस के एक अथवा दो बार से ज्यादा नये म्यूटेशन हो जाने पर इसको ‘वेरिएंटÓ कहते हैं। क्रम रहित (रेंडम) म्यूटेशन, जिसके परिणाम स्वरूप या तो वायरस को जीवित बने रहने का बेहतर मौका मिलता या फिर वह अप्रभावी बन जाता है, यह गुण-दोष उसकी अगली पीढिय़ों में स्वत: स्थानांतरित होता है। कुछ म्यूटेशन ऐसे होते हैं जो वायरस को निष्प्रभावी अथवा कम संक्रमणशील बना देते हैं।
यदि वेरियंट ज्यादा संक्रमणशील, बीमारी गंभीर अवस्था में पहुुंचाने वाला या फिर ऐसा हो, जिसके ऊपर वैक्सीन असर ही न करे, तब ग्रसित व्यक्ति के लिए यह म्यूटेशन चिंताजनक हो जाता है। ‘चिंता के विषयÓ सूची में कुछ मौजूदा वेरियंट्स हैं: अल्फा, बीटा, गामा और डेल्टा। इनमें कुछेक बीमारी को गंभीर अवस्था में पहुंचा सकते हैं, तो चंद ऐसे हैं जो मोनोक्लोनल एंटीबॉडी दवा या व्यक्ति में पिछले संक्रमण के वक्त पैदा हुई एंडीबॉडीज या फिर वैक्सीनजनित प्रभाव को चकमा दे देते हैं।
डेल्टा वेरियंट 100 से ज्यादा देशों में फैल चुका है और बहुत जगहों पर संक्रमण का मुख्य कारक है। आगे इसका ‘डेल्टा-प्लसÓ नामक एक उप-वेरियंट है, जिसका उद्भव महाराष्ट्र में हुआ था। इस वेरिएंट में पिछले कोविड वेरिएंट से बनने वाले लक्षणों के अलावा पेट दर्द, जी मितलाना, भूख में कमी और उल्टी आने के चिन्ह मिलते हैं। अन्य कई वेरिएंट्स को भी ‘चिंता का विषयÓ श्रेणी में रखा गया है, जिनको क्रमश: ईटा, एप्सीलॉन, थीटा और काप्पा कहा जाता है। ये भी अधिक संक्रमणशील हैं या फिर रोधप्रतिरोधक क्षमता को गच्चा देने वाले हैं। हालांकि इन सबके सबूत अभी प्रारंभिक हैं। इस महीने के शुरू में, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एक अन्य वेरियंट लैम्डा को भी ‘चिंता का विषयÓ सूची में रखा था। इसका उद्भव और पहली बार शिनाख्त पेरू में हुई है। पिछले चार सप्ताह में 30 से अधिक देशों में इसको पाया जा चुका है। कुछ अन्य वेरिएंट्स पर भी नजऱ रखी जा रही है। मसलन, आयोटा और ज़ीटा। इनके बारे में भी जानकारी पूरी तरह उपलब्ध नहीं है।
जनस्वास्थ्य विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि भारत में तीसरी लहर आकर रहेगी, बस सवाल यह है… कब? इस चिंता के पीछे लोगों का व्यवहार है, जो सावधानियों को नजऱअंदाज़ कर रहा है। यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय को दखल देकर धार्मिक समागमों पर रोक लगानी पड़ी है। केंद्रीय गृह सचिव ने इस बात पर विशेष ध्यान दिलाया है कि पहले ही कुछ सूबों में संक्रमण का आर-फैक्टर (प्रजनन अवयव) बढऩे लगा है। आर-फैक्टर उस दर का सूचकांक है, जिस पर संक्रमण बढ़ता है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हम लोगों ने सावधानी नहीं बरती और संक्रमण चक्र नहीं तोड़ा तो भारत में तीसरी लहर अगले दो महीनों में आ सकती है। 14 जुलाई तक, देश की केवल 31 फीसदी आबादी को टीका लग पाया है, इसमें भी दोनों खुराकें पाने वाले केवल 7.7 प्रतिशत लोग हैं। यह कहा जा रहा है कि शायद तीसरी लहर बच्चों को ज्यादा प्रभावित करने वाली होगी क्योंकि वैक्सीन 18 साल से ऊपर वालों को ही लग रही है। हालांकि इस विषय में डाटा विरोधाभासी है। एक ओर रिपोर्ट बताती है कि कोविड का शिकार बने बच्चों की संख्या बढ़ी है। जैसा कि पुणे के आंकड़े बताते हैं कि 1 से 7 जुलाई के बीच नये 2065 मामलों में बच्चों की गिनती 268 थी, वहीं दूसरी ओर पीजीआईएमआर चंडीगढ़ द्वारा करवाया गया सीरो-अध्ययन बताता है कि संक्रमित हो चुके कुल बच्चों के दो-तिहाई में पहले ही वायरस के प्रति एंटीबॉडीज बन चुकी हैं। लिहाजा, असली तस्वीर जानने के लिए कि आबादी में कितनों को संक्रमण छू चुका है, इसके लिए देश के विभिन्न भागों और आयु वर्गों में बड़े स्तर वाला सीरो-सर्वे करवाना चाहिए।
जीनोम-निगरानी के जरिए नये वेरिएंट्स पर नजर रखने की जरूरत है। केरल का हालिया डाटा बताता है कि नये मामलों का 62 प्रतिशत डेल्टा वेरिएंट की वजह से है, जिसके उपवर्ग में अल्फा (26 फीसदी), बीटा (8.24 फीसदी) तो काप्पा (2.7 फीसदी) का हिस्सा था। देशभर में अल्फा और काप्पा वेरिएंट्स का अनुपात सबसे अधिक केरल में पाया गया है। महाराष्ट्र और उत्तर-पूर्वी राज्यों में ज्यादातर मामले डेल्टा वेरिएंट वाले रहे हैं। कोविड के वेरिएंट यात्रियों के माध्यम से सीमाओं के पार जाकर फैलने के लिए कुख्यात हैं। डेल्टा का उद्भव भारत में हुआ लेकिन अब दुनियाभर के देशों में नये मामलों में 90 फीसदी से ज्यादा इसकी वजह से हैं। लैम्डा वेरिएंट, जो पेरू में उपजा है, उससे एशिया में केवल एक ही मामला इस्राइल में पाया गया है।
तीसरी लहर से बचना है तो हम सबको कोविड संबंधी रोकथाम संहिता का पालन करना होगा और गैर जरूरी घूमने, भीड़ लगाने और सामाजिक समागम करने से गुरेज करना चाहिए। संक्रमण की विषैली-कड़ी को तोडऩे के लिए वैक्सीन टीकाकरण बढ़ाना होगा, जिसकी बदौलत नये वेरिएंट्स पनपने की संभावना से बचा जा सकता है। इस बात का पूरा खतरा है कि कोई ‘भगोड़ा वेरिएंटÓ ऐसा भी आ सकता है, जो पूर्व में कोविड-ग्रसित हुए व्यक्ति में बनी एंटी-बॉडीज और मौजूदा वैक्सीन की प्रभावशीलता को चकमा दे जाए। ‘द नेचरÓ नामक प्रकाशन में आई फ्रांस की रिपोर्ट बताती है कि फ़ाइजऱ और एस्ट्रा-ज़ेनेका (कोविशील्ड) नामक टीके की पहली खुराक से डेल्टा वेरिएंट से केवल 33 फीसदी सुरक्षा बन पाई है। दूसरी खुराक के दो हफ्तों बाद फ़ाइजऱ की प्रभावशीलता 88 फीसदी तो एस्ट्रा-ज़ेनेका की 60 प्रतिशत रही।
इसलिए अति आवश्यक है कि नये बनने वाले वेरिएंट्स पर कड़ी नजऱ रखी जाए और जितनी जल्द समूचे विश्व को टीका लग पाएगा, उतनी जल्द ‘भगोड़े वेरिएंटÓ का खतरा कम हो जाएगा।
