सफलता की रौशनी में हिस्सेदारी का हुनर
मीराबाई चानू ओलंपिक से पदक लेकर लौटीं, देश का नाम रौशन किया, अपना नाम रौशन किया, गांव का नाम रौशन किया और एक पिज्जा का नाम रौशन करने की डील भी उन्होंने कर लिया। मीराबाई चानू इंटरनेट पर एक पिज्जा के साथ दिखायी देंगी। पिज्जा की उनकी सफलता में भूमिका क्या रही है, यह सवाल व्यर्थ है क्योंकि यह सवाल पूछा गया तो फिर और सवाल खड़े हो जायेंगे।
पिज्जा के बाद वह और भी तमाम ब्रांडों के साथ दिख सकती हैं। देश की बेटियां नाम रौशन कर रही हैं, पर जब उनका नाम रौशन हो जाता है, तो फिर उस रौशनी में हिस्सा मांगने बहुत आइटम बहुत ब्रांड आ जाते हैं। कोई पिज्जा आ जाता है। कोई कार आ जाती है। कोई बाइक आ जाती है। कोई बल्ब आ जाता है। कोई जूता आ जाता है। कोई आटा हो जाता है। कोई ब्रेड आ जाती है। कोई मोबाइल आ जाता है। खिलाडिय़ों की रौशनी के सैकड़ों हिस्सेदार उठ खड़े होते हैं। ब्रांड तो अपना भुगतान करते हैं। नेता भी उठ खड़े होते हैं, जिनका बस चले तो वह ओलंपिक खेलों के आयोजन का क्रेडिट भी खुद ही ले लें। बल्कि अगर ओलंपिक में नेताओं का बस चलता तो नेताओं के बेटे-बेटियां ही जाकर वहां खेल दिखा रहे होते। पीढ़ी दर पीढ़ी हॉकी के खिलाड़ी एक ही परिवार से आते। पीढ़ी दर पीढ़ी बैडमिंटन के खिलाड़ी एक ही परिवार से आते। सौभाग्य से ओलंपिक गेम्स नेतागिरी सऱीखे काम न हैं, यहां काम करके दिखाना पड़ता है। बाप का नाम काम न आता है। यह नेताओं का दुर्भाग्य है और खेलों का सौभाग्य है।
खैर, मीराबाई चानू के खेल का क्रेडिट एक पिज्जा को मिलेगा, यूं वह अब तक के खेल का क्रेडिट जूतों के एक ब्रांड को देती रही हैं। मेहनत और लगन की बात खिलाड़ी आम तौर पर कम करते हैं, जिनका सबसे बड़ा योगदान किसी भी खिलाड़ी की कामयाबी में होता है। मेहनत अगर किसी वाशिंग पाउडर का नाम होता और लगन किसी ब्यूटी क्रीम का नाम होता, तो जरूर ही खिलाड़ी मेहनत और लगन का जिक्र करते अपनी कामयाबी में। पर अभी मेहनत नाम का वाशिंग पाउडर न है और लगन नाम की कोई ब्यूटी क्रीम न है, सो मेहनत और लगन की बात कम ही करते हैं खिलाड़ी।
इधर खिलाड़ी कामयाब होता है, उधर उसके इर्दगिर्द ब्रांड मंडराने लगते हैं। ब्रांड भी एक तरह से परजीवी टाइप ही होते हैं, अपने बूते खड़े होने में आफत आती है। अगर कोई वाशिंग पउडर है, तो उसे अपनी ही क्वालिटी से चमकना चाहिए न कि अमिताभ बच्चन की ऊंचाई का सहारा लेकर बिकना चाहिए। इसलिए मोटे तौर पर यही माना जा सकता है कि अगर मीराबाई चानू ही खुद क्रेडिट दे रही हैं, तो किसी को क्या आपत्ति हो सकती है। मीराबाई की कामयाबी का राज कोई पिज्जा है, यह बात नये खिलाडिय़ों को पूरे तौर पर न समझनी चाहिए। उन्हें मीराबाई की मेहनत देखनी चाहिए, लगन देखनी चाहिए। लगातार काम करते रहने का जज्बा देखना चाहिए। मीराबाई का सिर्फ पिज्जा न देखना चाहिए।
